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“हिंदुओं के पक्ष में फैसला मत देना”… जज पर महाभियोग से निकला खौफनाक संदेश?

डीएमके के नेतृत्व में इंडिया ब्लॉक के 100 से अधिक सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग का नोटिस सौंपा, जिस पर कांग्रेस की प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, और अन्य सहयोगी दलों के नेताओं के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं

तमिलनाडु के थिरुप्परंकुंद्रम मंदिर–दरगाह विवाद में मद्रास हाईकोर्ट के जज जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग की तैयारी, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और हिंदू धार्मिक अधिकारों दोनों के लिए अत्यंत खतरनाक राजनीतिक मिसाल बन रही है। यह कदम सरकारों और सत्तारूढ़ गठबंधनों के उस प्रवृत्ति को मजबूत करता है जिसमें वे अपने वैचारिक एजेंडे के अनुसार न्यायिक फैसलों को “इनाम” या “सज़ा” देने की मानसिकता विकसित कर चुके हैं।

मामला क्या है?

जस्टिस स्वामीनाथन ने 1 और 3 दिसंबर के आदेशों में मदुरै के पास थिरुप्परंकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित अरुलमिघु सुब्रमण्य स्वामी मंदिर के दीपथून (पत्थर के स्तंभ) पर पारंपरिक कार्तिगई दीपम जलाने की अनुमति देते हुए मंदिर प्रशासन को यह धार्मिक परंपरा निभाने का निर्देश दिया। दीपथून मंदिर परिसर के भीतर है लेकिन उसके पास एक दरगाह भी स्थित है और लंबे समय से वहां दीप जलाने की परंपरा चलती रही है, जिसे लेकर हाल के वर्षों में विवाद खड़ा किया गया।

राज्य सरकार ने इस आदेश को लागू करने से मना करते हुए कानून-व्यवस्था का बहाना बनाया, जबकि अदालत ने स्पष्ट किया था कि प्रशासन की जिम्मेदारी शांतिपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करना है, न कि पारंपरिक धार्मिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाना। इसके बावजूद प्रशासनिक अवमानना के आरोप सामने आए और मामला सीधे न्यायपालिका बनाम सरकार की टकराहट में बदल गया।​

महाभियोग की पहल और राजनीतिक गणित

डीएमके के नेतृत्व में इंडिया ब्लॉक के 100 से अधिक सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग का नोटिस सौंपा, जिस पर कांग्रेस की प्रियंका गांधी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, और अन्य सहयोगी दलों के नेताओं के हस्ताक्षर बताए जा रहे हैं। नोटिस में “सांप्रदायिक पूर्वाग्रह”, “न्यायिक अनुशासनहीनता”, और “धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के उल्लंघन” जैसे आरोप लगाए गए हैं, साथ ही यह दावा किया गया है कि जज ने कुछ खास वकीलों और एक विशेष समुदाय को अनुचित लाभ पहुँचाया।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(4), 217 और न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 के तहत जज पर महाभियोग का मानक अत्यंत कड़ा है, जहाँ “सिद्ध कदाचार या अक्षमता” जैसे गंभीर और प्रमाणित आरोप आवश्यक हैं; महज़ निर्णय की वैचारिक असहमति या राजनीतिक असुविधा इस प्रक्रिया का वैध आधार नहीं हो सकती। कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने भी संकेत दिया है कि किसी एकल न्यायिक आदेश या सांप्रदायिकता के आरोप के आधार पर महाभियोग की मांग न्यायिक समीक्षा की मूल भावना के प्रतिकूल है।

सरकार का चरित्र और दोहरा मापदंड

तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने पहले अदालत का आदेश मानने से साफ इनकार किया और कानून-व्यवस्था का हवाला देकर मंदिर में दीप जलाने की पारंपरिक हिंदू प्रथा को रोकने की कोशिश की, जबकि यही सरकार अन्य धार्मिक समुदायों के जलूस, इबादत या पर्व-त्योहारों के मामले में अक्सर “संवेदनशीलता” और “सद्भाव” का तर्क देकर सहमति जताती दिखती है। यह व्यवहार स्पष्ट करता है कि सरकार के लिए “धर्मनिरपेक्षता” का अर्थ सिर्फ हिंदू आस्थाओं पर प्रतिबंध और धार्मिक अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण राजनीति तक सीमित होकर रह गया है।​​

इसके साथ ही, डीएमके और उसके सहयोगी दलों ने जिस तेजी और “जुनून” के साथ जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग की पहल की, वह यह संदेश देता है कि यदि कोई जज सरकार की वैचारिक लाइन के विरुद्ध जाकर हिंदू पक्ष के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है तो उसे “उदाहरण” बना दिया जाएगा। यह रुझान आने वाले समय में न्यायाधीशों पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ाने, और उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका में “सुरक्षित” फैसले देने के लिए मजबूर करने वाली मानसिकता को जन्म दे सकता है।​

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला

महाभियोग जैसी असाधारण प्रक्रिया का इस्तेमाल केवल उन मामलों में किया जाना चाहिए जहाँ जज खुले तौर पर भ्रष्टाचार, नैतिक पतन या स्पष्ट रूप से साबित दुराचरण में लिप्त हो; लेकिन यहाँ मुद्दा एक न्यायिक व्याख्या और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा से जुड़ा है, जिसे राजनीतिक रंग देकर “सांप्रदायिकता” घोषित कर दिया गया। यदि न्यायाधीशों को यह संदेश मिले कि किसी भी विवादास्पद लेकिन संवैधानिक रूप से न्यायपूर्ण आदेश के बाद उनके खिलाफ संसद में महाभियोग की तलवार लटक सकती है, तो न्यायिक निष्पक्षता और निर्भीकता दोनों बुरी तरह प्रभावित होंगी।

इतिहास बताता है कि भारत में जजों पर महाभियोग की पहलें बेहद दुर्लभ रही हैं और अधिकांश मामलों में संसद ने उच्च मानक को ध्यान में रखकर इन्हें आगे नहीं बढ़ाया, ताकि न्यायपालिका पर राजनीतिक नियंत्रण की मिसाल न बन जाए; लेकिन वर्तमान प्रकरण में विपक्षी दलों द्वारा संख्या बल के प्रदर्शन के जरिए जज को घेरना न्यायिक संस्थाओं के प्रति असम्मान और संवैधानिक संतुलन की अनदेखी है।

हिंदू अधिकार और “धर्मनिरपेक्षता” की परिभाषा

दिलचस्प यह है कि जिस आदेश को “धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ” बताया जा रहा है, वह मूलतः एक मंदिर–सम्पत्ति के भीतर, सदियों पुरानी परंपरा के अनुरूप दीप जलाने की अनुमति से जुड़ा है, जिसे अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 25–26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के दायरे में देखा। विरोध करने वालों का तर्क यह है कि पास की दरगाह के अनुयायियों की “भावनाएँ” आहत होंगी, जबकि अदालत ने जोर देकर कहा कि परंपरा शांतिपूर्वक और प्रशासनिक नियंत्रण में निभाई जाए, किसी अन्य समुदाय के अधिकारों से टकराव पैदा किए बिना।

सरकार और उसके समर्थक दल इस पूरे विवाद को “सांप्रदायिक तनाव” बनाम “शांति” की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि वस्तुतः यह प्रश्न है कि क्या हिंदू धार्मिक परंपराएँ भी उतने ही संवैधानिक संरक्षण की हकदार हैं जितनी किसी अन्य समुदाय की मजहबी रस्में। अगर हर बार हिंदू आस्थाओं को ही “कानून-व्यवस्था” के नाम पर रोका जाएगा और अदालत द्वारा इन अधिकारों की रक्षा करने पर जज को कटघरे में खड़ा कर दिया जाएगा, तो यह तथाकथित धर्मनिरपेक्षता, दरअसल, परोक्ष रूप से एकतरफा भेदभाव का औजार बन जाएगी।

आगे का रास्ता और लोकतांत्रिक जोखिम

यदि लोकसभा अध्यक्ष इस महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं और जाँच समिति गठित होती है, तो यह पूरी प्रक्रिया न केवल जस्टिस स्वामीनाथन के करियर पर, बल्कि पूरे न्यायिक ढाँचे पर दीर्घकालिक प्रभाव डालेगी; अन्य जज भी भविष्य के निर्णयों में राजनीतिक प्रतिक्रियाओं को ध्यान में रखकर चलने को विवश हो सकते हैं। अगर यह प्रस्ताव शुरुआती स्तर पर ही खारिज हो जाता है, तब भी महाभियोग की धमकी का यह “प्रीसेडेंट” राजनीतिक दलों के हाथ में एक स्थायी हथियार बन चुका होगा, जिसे वे समय–समय पर न्यायपालिका पर दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

लोकतंत्र में तीनों स्तंभों – विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका – के बीच स्वस्थ दूरी और परस्पर सम्मान अनिवार्य है; लेकिन मंदिर–दीप विवाद में सरकारें जिस तरह न्यायिक आदेश को मानने से इनकार कर रही हैं और विपक्षी गठबंधन जिस तरीके से एक जज को वैचारिक आधार पर निशाना बना रहा है, वह बताता है कि भारतीय राजनीति संविधान से ऊपर “वोट बैंक” और “सभ्यता–संघर्ष” की भाषा को तरजीह देने लगी है। ऐसी स्थिति में नागरिक समाज, बार काउंसिल, और व्यापक मीडिया पर जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह इस मुद्दे को महज़ “पार्टी–पॉलिटिक्स” नहीं, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार और संवैधानिक व्यवस्था के भविष्य के सवाल के रूप में उठाए और सरकारों के इस खतरनाक खेल पर कठोर नैतिक प्रश्न खड़े करे।​​

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