भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो अचानक ऐसे संकट में फंस गई है कि एयरपोर्ट पर अफरा-तफरी, सोशल मीडिया पर गुस्सा और सरकार तक को दखल देना पड़ा है। हज़ारों यात्रियों की फ्लाइट्स कैंसिल या घंटों लेट हुईं, टिकटों के दाम आसमान छूने लगे और सवाल यह उठने लगा कि क्या इंडिगो “टू बिग टू फेल” वाली स्थिति में पहुँच चुकी है।
संकट शुरू कैसे हुआ?
दिसंबर की शुरुआत से ही इंडिगो की सैकड़ों फ्लाइट्स लगातार कैंसिल और डिले होने लगीं, कई दिनों में एक दिन में ही 500 से ज़्यादा उड़ानें प्रभावित हुईं। शादी और छुट्टियों के पीक सीज़न में अचानक हुए इस मैन-मेड संकट ने लाखों यात्रियों की यात्रा योजनाएँ बिगाड़ दीं और एयरपोर्ट्स पर लंबी कतारें, बिखरा हुआ सामान और गुस्साए यात्रियों की तस्वीरें आम हो गईं।
असली वजह: नए FDTL नियम और पायलट संकट
सरकार ने पायलटों की थकान कम करने और फ्लाइट सेफ्टी बढ़ाने के लिए नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियम लागू किए, जिनमें खास तौर पर नाइट ऑपरेशंस और रेस्ट पीरियड को लेकर सख्ती बढ़ाई गई। इंडिगो इस डेडलाइन से पहले अपने पायलटों की संख्या, शेड्यूलिंग और रोस्टर को नए नियमों के हिसाब से एडजस्ट नहीं कर पाई, नतीजा यह हुआ कि कागज़ पर ड्यूटी पर दिख रहे कई पायलट हकीकत में उड़ान भरने के लिए कानूनी घंटों की सीमा पार कर चुके थे।
पायलट यूनियनों और विशेषज्ञों का आरोप है कि एयरलाइन ने दो साल की तैयारी की विंडो होने के बावजूद पायलट हायरिंग पर फ्रीज़, पायलट पे फ्रीज़ और नॉन-पोचिंग एग्रीमेंट जैसे फैसले लेकर खुद ही अपने लिए स्टाफिंग संकट पैदा कर लिया। नतीजतन नए नियम लागू होते ही प्लानिंग ढह गई और इंडिगो के पास अपने बड़े घरेलू नेटवर्क को ऑपरेट करने के लिए पर्याप्त “कानूनी तौर पर फिट” पायलट ही नहीं बचे।
यात्रियों पर क्या बीती?
रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ ही दिनों में देश भर में इंडिगो की दो हज़ार से ज़्यादा उड़ानें रद्द हो गईं और कई सौ फ्लाइट्स घंटों लेट रहीं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे बड़े हब पर यात्रियों को रात भर फर्श पर सोना पड़ा, बच्चों और बुज़ुर्गों सहित यात्रियों की भीड़ चेक-इन काउंटर से लेकर बैगेज बेल्ट तक फँसी रही।
इतने बड़े स्तर पर इंडिगो की उड़ानें बंद होने से दूसरे एयरलाइनों की सीटों की मांग अचानक बढ़ गई और किराए में तेज़ उछाल दिखा, जिस पर काबू पाने के लिए सरकार को प्राइस कैप लगाने तक की नौबत आ गई। इंडिगो पर दबाव बढ़ने के साथ ही एयरलाइन ने कैंसिलेशन और रिस्केड्यूलिंग चार्जेस माफ करने, और सैकड़ों करोड़ रुपये के रिफंड प्रोसेस करने की घोषणा की, ताकि कम से कम आर्थिक नुकसान की भरपाई यात्रियों को हो सके।
सरकार और नियामक की सख़्त एंट्री
डीजीसीए ने इंडिगो के सीईओ को नोटिस भेजकर पूछा कि इतने बड़े ऑपरेशनल ब्रेकडाउन पर एयरलाइन के खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए, जिसमें जुर्माना, अधिकारियों पर पेनल्टी और फ्लाइट कटौती जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने भी हवाई किराए पर लिमिट लगाने, रिफंड टाइमलाइन तय करने और समग्र स्थिति पर रिपोर्ट मांगने जैसे कदम उठाए, ताकि संकट और न बढ़े।
दबाव बढ़ने पर नियामक ने कुछ पायलट रेस्ट से जुड़े प्रावधानों में अस्थायी ढील भी दी, ताकि कम से कम तुरंत ऑपरेशन आंशिक रूप से बहाल हो सकें, हालांकि इससे पायलट थकान को लेकर बहस और तेज़ हो गई। इंडिगो की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि 10–15 दिसंबर तक स्थिति सामान्य हो जाएगी, लेकिन ब्रांड इमेज और भरोसे को हुई क्षति की भरपाई में ज़्यादा समय और पैसे लग सकते हैं।
“टू बिग टू फेल” सवाल और इंडियन एविएशन की कमज़ोरियाँ
इंडिगो घरेलू मार्केट में लगभग दो-तिहाई हिस्सेदारी रखने वाली एयरलाइन है, इसलिए जब वह लड़खड़ाती है तो पूरा एविएशन इकोसिस्टम हिल जाता है — स्लॉट्स, कनेक्टिंग फ्लाइट्स, किराए, टूरिज्म सब कुछ। इस घटना ने दिखा दिया कि अगर किसी देश के एविएशन सेक्टर में एक–दो बड़े खिलाड़ियों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भरता हो, तो उनकी किसी भी मैनेजमेंट गलती का सीधा असर आम यात्रियों और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
विशेषज्ञ अब पायलट वेलफेयर, थकान प्रबंधन, बेहतर वर्कफोर्स प्लानिंग, और रेगुलेटरी ओवरसाइट पर ज्यादा पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, ताकि “शॉर्ट टर्म प्रॉफिट” के नाम पर सेफ्टी और सर्विस क्वालिटी से समझौता न हो सके। इंडिगो संकट ने यह भी साफ कर दिया है कि भारत को तेजी से बढ़ते हवाई यातायात के साथ तालमेल बैठाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर, रेगुलेशन और मानव संसाधन — तीनों मोर्चों पर लंबी प्लानिंग की जरूरत है।


