भारत के सबसे बड़े फाइटर जेट सौदे पर पर्दा उठने ही वाला है – 114 राफेल MRFA डील सिर्फ एक खरीद नहीं, बल्कि आने वाले 30 साल तक आसमान पर भारत की बादशाहत तय कर सकती है। चीन–पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर प्रेशर बढ़ने के बीच यह डील अगर फाइनल होती है तो भारतीय वायुसेना के लिए गेम‑चेंजर साबित होगी।
114 राफेल: डील इतनी बड़ी क्यों?
भारतीय वायुसेना ने रक्षा मंत्रालय को 114 ‘मेक इन इंडिया’ राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद का प्रस्ताव भेजा है, जिसकी अनुमानित कीमत 2 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा बताई जा रही है। यह भारत के इतिहास की अब तक की सबसे महंगी रक्षा डील बन सकती है, जो वायुसेना की स्क्वाड्रन स्ट्रेंथ को 31 से बढ़ाकर 42 के लक्ष्य के करीब ले जाने में मदद करेगी।
मेक इन इंडिया: आकाश में भी ‘मेड इन इंडिया’
इस प्रोजेक्ट की खास बात यह है कि ज्यादातर राफेल भारत में ही बनेंगे, जहां फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट भारतीय एयरोस्पेस कंपनियों के साथ मिलकर प्रोडक्शन लाइन लगाएगी। अनुमान है कि 60% से ज्यादा सामग्री और सिस्टम स्वदेशी होंगे, जिससे इंडियन डिफेंस इंडस्ट्री में भारी निवेश, नई जॉब्स और हाई‑टेक मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम खड़ा होगा।
ऑपरेशन ‘सिंदूर’ ने बदला खेल
हालिया ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में राफेल ने लंबी दूरी से प्रीसिजन स्ट्राइक कर के अपनी क्षमता साबित की, जिससे IAF का झुकाव और भी ज्यादा इस प्लेटफॉर्म की ओर हो गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, राफेल के एडवांस इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम ने दुश्मन की लॉन्ग‑रेंज मिसाइलों को भी बेअसर कर दिया, जो निर्णयकर्ताओं के लिए मजबूत सिग्नल बना।
MRFA टेंडर से सीधा G2G डील तक
पहले 114 फाइटर जेट्स के लिए MRFA नाम से ग्लोबल टेंडर की बात चल रही थी, जिसमें F‑18, F‑21, ग्रिपेन, टाइफून, Su‑35 और MiG‑35 जैसी दावेदार कंपनियां शामिल थीं। लेकिन जटिल और लंबी टेंडर प्रक्रिया के बजाय अब तस्वीर यह बन रही है कि भारत सीधे सरकार‑से‑सरकार (G2G) फॉर्मेट में फ्रांस से राफेल डील फाइनल करना चाहता है, ताकि समय बच सके और बातचीत ज्यादा क्लियर हो।
114 राफेल बनाम ड्रैगन–जिहाद कॉम्बो
रणनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 114 राफेल के आने के बाद IAF के पास इतना दम होगा कि वह एक साथ पश्चिमी (पाकिस्तान) और उत्तरी (चीन) मोर्चे पर एयर डॉमिनेंस स्थापित कर सके। कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स यह तक कह रही हैं कि अगर यह डील पूरी तरह लागू हो गई, तो J‑10C, JF‑17 और यहां तक कि J‑20 जैसे चीनी प्लेटफॉर्म को भी दक्षिण एशिया के आसमान में खुली चुनौती मिल जाएगी।
डील में ट्विस्ट: सिर्फ 114 राफेल नहीं?
कुछ रिपोर्ट्स का दावा है कि भारत की नई स्ट्रैटेजी में 114 राफेल की बजाय लगभग 60 राफेल F4 सीधे फ्रांस से खरीदने और बाकी संख्या को फिफ्थ‑जनरेशन स्टेल्थ फाइटर्स से भरने पर भी विचार हुआ है। इसका मतलब यह हो सकता है कि भविष्य में राफेल + स्टेल्थ कॉम्बो के जरिए IAF एक हाइब्रिड हाई‑एंड फ्लीट बनाना चाहती है, जो टेक्नोलॉजी के मामले में कई प्रतिद्वंद्वियों से आगे हो।
किलर कॉम्बो: राफेल + तेजस + फ्यूचर फाइटर
IAF की भविष्य की योजना में सुखोई‑30MKI, राफेल, LCA तेजस Mk1A/Mk2 और आने वाला स्वदेशी पांचवी पीढ़ी का फाइटर (AMCA) मिलकर एक मल्टी‑लेयर किलर कॉम्बो तैयार करेंगे। इस इकोसिस्टम में राफेल हाई‑एंड स्ट्राइक और एयर‑सुपीरियरिटी के लिए बैकबोन की तरह काम करेगा, जबकि तेजस और अन्य प्लेटफॉर्म नंबर और फ्लेक्सिबिलिटी देंगे।
सौदा अटका कहां है?
नेगोशिएशन में सबसे बड़ी चुनौतियों में कीमत, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की गहराई और सॉफ्टवेयर/सोर्स‑कोड जैसे सेंसिटिव एरिया शामिल हैं, जहां फ्रांस बहुत सावधानी से आगे बढ़ रहा है। दूसरी ओर, भारत इतनी विशाल राशि खर्च करने से पहले अधिकतम इंडस्ट्रियल बेनिफिट, लोकल प्रोडक्शन और दीर्घकालीन मेंटेनेंस फायदे लिखित रूप में सुनिश्चित करना चाहता है।